कवि-परिचय (संक्षेप में)
जन्म: सन् 1899 में महिषादल (बंगाल) में हुआ। इनका पैतृक गाँव गढ़ाकोला (उन्नाव, उत्तर प्रदेश) था।
काव्य विशेषताएँ: वे छायावाद के प्रमुख स्तंभ हैं। उन्होंने हिंदी कविता में सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनकी रचनाओं में क्रांति, विद्रोह, प्रकृति का विराट रूप और उपेक्षितों के प्रति गहरी करुणा दिखाई देती है।
प्रमुख कृतियाँ: अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते आदि।
कविता का मूल भाव
इस कविता में कवि ने भारतभूमि को एक दिव्य देवी (माता सरस्वती/भारत माता) के रूप में मानवीकृत किया है। कवि देश की प्राकृतिक सुषमा, समृद्ध कृषि परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और भौगोलिक विस्तार का वंदन करते हुए भारत की विजय की कामना करते हैं।
पद्यांश-वार व्याख्या
भारति, जय, विजयकरे !
कठिन शब्दार्थ:
भारति/भारती: माँ सरस्वती, वाणी की अधिष्ठात्री, भारतमाता।
जय: जयकार, विजय।
विजयकरे: विजय प्रदान करने वाली या विजय करने वाली।
अर्थ: हे माँ भारती (भारतमाता)! आपकी जय हो, आप सर्वत्र विजय प्रदान करने वाली हैं।
कनक-शस्य-कमलधरे !
कठिन शब्दार्थ:
कनक: सोना, स्वर्ण।
शस्य: फसल, अन्न, पैदावार।
कनक-शस्य: सोने के समान पीली, लहलहाती फसलें।
कमलधरे: हाथों में कमल धारण करने वाली।
अर्थ: आप सोने के समान सुनहली फसलों से समृद्ध हैं और अपने हाथों में ज्ञान व पवित्रता का प्रतीक कमल धारण किए हुए हैं।
लंका पदतल शतदल,
कठिन शब्दार्थ:
पदतल: पैरों के नीचे, तलवा।
शतदल: सौ पंखुड़ियों वाला कमल।
अर्थ: भारतभूमि के चरणों के नीचे लंका ऐसे शोभित है मानो चरणों में अर्पित कोई खिला हुआ कमल हो।
गर्जितोर्मि सागर-जल
कठिन शब्दार्थ:
गर्जितोर्मि: गरजती हुई तरंगों/लहरों से युक्त (गर्जित + ऊर्मि)।
सागर-जल: समुद्र का पानी।
अर्थ: दक्षिण में गरजती हुई ऊँची-ऊँची लहरों वाला विशाल महासागर का जल—
धोता शुचि चरण युगल
कठिन शब्दार्थ:
शुचि: पवित्र, शुद्ध, निर्मल।
चरण युगल: दोनों पैर (युगल = जोड़ा)।
अर्थ: माँ भारती के दोनों पवित्र और निर्मल चरणों को निरंतर पखारता (धोता) रहता है।
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे !
कठिन शब्दार्थ:
स्तव: स्तुति, स्तोत्र, प्रशंसा-गान।
बहु-अर्थ-भरे: अनेक गहरे अर्थों और भावों से परिपूर्ण।
अर्थ: समुद्र की लहरों की गर्जना ऐसी प्रतीत होती है मानो वह गंभीर व अनेक अर्थों से भरे हुए स्तुति-गीत गा रहा हो।
तरु-तृण-वन-लता वसन,
कठिन शब्दार्थ:
तरु: वृक्ष, पेड़।
तृण: तिनका, घास।
लता: बेल, वल्लरी।
वसन: वस्त्र, परिधान, आवरण।
अर्थ: भारत में फैली वनस्पति—वृक्ष, घास, घने जंगल और लताएँ—माँ के शरीर पर सजे वस्त्रों के समान हैं।
अंचल में खचित सुमन;
कठिन शब्दार्थ:
अंचल: वस्त्र का छोर, पल्लू, आँचल।
खचित: जड़ा हुआ, टँका हुआ, अंकित।
सुमन: पुष्प, फूल।
अर्थ: प्रकृति रूपी इन वस्त्रों के आँचल में रंग-बिरंगे सुंदर फूल मोतियों और रत्नों की तरह जड़े हुए हैं।
गंगा ज्योतिर्जल-कण
कठिन शब्दार्थ:
ज्योतिर्जल: प्रकाशमय जल, चमकीला व निर्मल पानी (ज्योतिस् + जल)।
कण: बूँदें या छोटे अंश।
अर्थ: गंगा नदी का प्रकाशमय, दैवीय और निर्मल जल—
धवल धार हार गले।
कठिन शब्दार्थ:
धवल: श्वेत, सफेद, उज्ज्वल।
धार: जल की धारा।
अर्थ: अपनी सफेद और स्वच्छ धारा के रूप में माँ भारती के गले में जगमगाते मोतियों के हार की तरह सुशोभित है।
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
कठिन शब्दार्थ:
शुभ्र: उज्ज्वल, चमकदार, श्वेत।
हिम-तुषार: बर्फ और पाले की चादर (हिम = शीतल बर्फ, तुषार = पाला/बर्फ)।
अर्थ: उत्तर में स्थित हिमालय की उज्ज्वल, श्वेत बर्फ भारत माता के शीश पर सजा दिव्य मुकुट है।
प्राण प्रणव ओंकार,
कठिन शब्दार्थ:
प्राण: जीवन-तत्व, आत्मा, जीवन।
प्रणव ओंकार: पवित्र नाद 'ॐ' (परमेश्वर का वाचक मंत्र)।
अर्थ: पवित्र प्रणव ध्वनि 'ओंकार' (ॐ) ही इस देश का मूल आत्म-तत्व, जीवन और प्राण है।
ध्वनित दिशाएँ उदार,
कठिन शब्दार्थ:
ध्वनित: गूँजती हुई, गुंजायमान।
उदार: विराट, व्यापक, महान।
अर्थ: यहाँ का विराट और उदार सांस्कृतिक चिंतन चारों दिशाओं में निरंतर गूँज रहा है।
शतमुख-शतरव-मुखरे!
कठिन शब्दार्थ:
शतमुख: सैकड़ों मुखों से।
शतरव: सैकड़ों प्रकार की ध्वनियाँ/स्वर (रव = ध्वनि, आवाज)।
मुखरे/मुखर: गूँजने वाली, बजती हुई, शब्द करने वाली।
अर्थ: सैकड़ों मुखों से निकलने वाले विविध स्वरों, भाषाओं और बोलियों की गूँज से यह संपूर्ण भारत राष्ट्र सदैव जीवंत और मुखरित रहता है।
काव्य-सौंदर्य की प्रमुख विशेषताएँ
भाषा: तत्समप्रधान, गंभीर एवं संस्कृतनिष्ठ हिंदी।
अलंकार:
मानवीकरण व रूपक अलंकार: संपूर्ण भारतभूमि को एक सजीव देवी का रूप देना, हिमालय को मुकुट तथा गंगा को गले का हार बताना।
अनुप्रास अलंकार: 'शतमुख-शतरव-मुखरे' और 'तरु-तृण' जैसे पदों में वर्णों की आवृत्ति।
रस: शांत रस एवं देशप्रेम से युक्त वीर/भक्ति रस की मिली-जुली ओजस्वी भावना।
"रचना से संवाद: मेरे उत्तर मेरे तर्क"
1. "भारति, जय, विजयकरे" कविता में विशेष रूप से—
सही उत्तर: (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
तर्क: कविता में 'भारति' (ज्ञान/सरस्वती), 'कनक-शस्य' (फसलों की संपन्नता), तथा गंगा, हिमालय, तरु-लता व सागर जैसे प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से भारत के ज्ञान, वैभव और प्राकृतिक सौंदर्य का समग्र वंदन किया गया है।
2. "कनक-शस्य-कमल धरे" पंक्ति का भावार्थ है—
सही उत्तर: (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
तर्क: यहाँ 'कनक' का अर्थ सोना और 'शस्य' का अर्थ फसल व अन्न है। सोने जैसी लहलहाती फसलें देश की कृषि-समृद्धि और धन-धान्य की प्रचुरता को दर्शाती हैं।
3. समस्त विश्व में भारत के महत्त्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—
सही उत्तर: (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/शतमुख-शतरव-मुखरे!
तर्क: इन पंक्तियों में भारत के उदार चिंतन, आध्यात्मिक नाद और विविध संस्कृतियों/भाषाओं की गूँज का सभी दिशाओं में फैलना व्यक्त हुआ है, जो वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव व गौरव की घोषणा करता है।
4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
सही उत्तर: (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
तर्क: पूरी कविता में 'गर्जितोर्मि', 'ज्योतिर्जल-कण', 'हिम-तुषार', 'शतदल' जैसे तत्सम शब्दों और सामासिक पदों की बहुलता है, जो छायावादी काव्य-शैली की मुख्य पहचान है।
5. भारत के वस्त्रों में 'तरु-तृण-वन-लता' और गले में 'गंगा-धारा' को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
सही उत्तर: (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
तर्क: वनस्पति (तरु, लता, तृण) पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं और गंगा भारत की प्राचीन आध्यात्मिक व सांस्कृतिक चेतना की संवाहक है। इन्हें भारतमाता के वस्त्राभूषण मानकर कवि प्रकृति संरक्षण और सांस्कृतिक गरिमा दोनों का बोध कराते हैं।
अर्थ और भाव अभ्यास के प्रश्नों के अर्थ व भाव स्पष्टीकरण:
(क) “लंका पदतल शतदल, / गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल !”
सरल अर्थ:
भारतमाता के चरणों के नीचे लंका सौ पंखुड़ियों वाले खिले हुए कमल के समान स्थित है।
दक्षिण दिशा में स्थित महासागर की गरजती और उछलती हुई लहरों का जल भारतमाता के दोनों पवित्र चरणों को निरंतर पखारता (धोता) रहता है।
भाव:
कवि ने भारत के दक्षिणी छोर की भौगोलिक स्थिति का अत्यंत मनोरम व आध्यात्मिक मानवीकरण किया है।
भारतमाता को एक दिव्य देवी के रूप में देखा गया है, जिनकी पूजा में प्रकृति स्वयं समर्पित है—लंका उनके चरणों में अर्पित कमल के समान है और विशाल हिंद महासागर उनकी सेवा में रत होकर निरंतर उनके चरण धो रहा है।
(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, / ध्वनित दिशाएँ उदार, / शतमुख-शतरव-मुखरे!”
सरल अर्थ:
पवित्र प्रणव नाद 'ओंकार' (ॐ) ही भारत का मूल जीवन-तत्व और प्राण है।
यहाँ का उदार एवं विराट चिंतन सभी दिशाओं में गूँजायमान हो रहा है।
सैकड़ों मुखों से निकलने वाले विविध स्वरों, भाषाओं और विचारों की ध्वनियों से यह संपूर्ण राष्ट्र निरंतर मुखरित (सचेतन) रहता है।
भाव:
यह पंक्ति भारत की आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विविधता की एकता को व्यक्त करती है।
भारत केवल भौगोलिक भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि 'ॐ' की आध्यात्मिक चेतना से स्पंदित एक जीवंत सत्ता है।
विभिन्न भाषाओं, बोलियों और संस्कृतियों के सैकड़ों स्वर मिलकर भी एक ही उदार भारतीय राष्ट्र के गौरव का गान करते हैं।
मेरी समझ मेरे विचार :
1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
उत्तर: कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की प्रखर देशप्रेम, राष्ट्रीय चेतना और श्रद्धा-भक्ति की भावना अभिव्यक्त हुई है। कवि भारत को केवल एक भौगोलिक भूभाग न मानकर उसे एक साक्षात दिव्य देवी (ज्ञानदायिनी सरस्वती और भारतमाता) के रूप में देखते हैं तथा संपूर्ण विश्व में उसके गौरव, संप्रभुता और विजय की कामना करते हैं।
2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तर:
प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन: कवि ने प्रकृति को भारतमाता के आभूषणों और वस्त्रों के रूप में चित्रित किया है। पेड़, पौधे, घास और लताएँ माँ के सुंदर वस्त्र हैं, जिनमें फूल रत्नों की तरह टँके हैं। गंगा की निर्मल श्वेत धारा गले का हार है, हिमालय बर्फ का चमकीला मुकुट है और हिंद महासागर चरणों को पखारने वाला सेवक है।
प्रकृति संरक्षण और देशप्रेम: हाँ, प्रकृति का संरक्षण करना निश्चित रूप से देशप्रेम का कार्य है। देश केवल सीमाओं या नागरिकों से नहीं बनता, बल्कि उसकी नदियाँ, पर्वत, वन और वन्यजीव ही उसकी वास्तविक संपदा व जीवनरेखा हैं। यदि हम प्रकृति को नष्ट होने से बचाते हैं, तो हम वास्तव में देश के भविष्य, स्वास्थ्य और समृद्धि की रक्षा करते हैं।
3. "कनक-शस्य-कमलधरे!" पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तर: यह पंक्ति भारतभूमि की दो प्रमुख विशेषताओं की ओर संकेत करती है:
कृषि-संपन्नता (कनक-शस्य): 'कनक' (सोना) और 'शस्य' (फसल)—यह भारत की उर्वर भूमि, लहलहाती फसलों, अन्न की प्रचुरता और किसानों के श्रम से उपजी आर्थिक संपन्नता को दर्शाता है।
ज्ञान एवं पवित्रता (कमलधरे): हाथों में कमल धारण करना माँ सरस्वती का प्रतीक है, जो भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा, आध्यात्मिक चेतना, निर्मलता और सांस्कृतिक शुचिता को व्यक्त करता है।
4. "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तर: हिमालय को भारत का मुकुट इसलिए कहा गया है क्योंकि:
भौगोलिक स्थिति: मुकुट सिर के सबसे ऊपरी भाग पर पहना जाता है, और हिमालय भी भारत के नक्शे में सबसे शीर्ष (उत्तर दिशा) पर अडिग खड़ा है।
दिव्य और श्वेत रूप: हिमालय की चोटियाँ साल भर धवल (सफेद) बर्फ और पाले से ढकी रहती हैं, जो देखने में किसी चमकीले, भव्य और चाँदी जैसे मुकुट के समान सुशोभित होती हैं।
गौरव का प्रतीक: मुकुट सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक होता है; उसी प्रकार हिमालय भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और विराटता का गौरवमय प्रतीक है।
विधा से संवाद: कविता का सौंदर्य
दी गई काव्य-विशेषताओं के आधार पर कविता की संबंधित पंक्तियों की तालिका:
| कविता की पंक्तियाँ | |
| प्रकृति का मानवीकरण | • तरु-तृण-वन-लता वसन, / अंचल में खचित सुमन; • गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल |
| आलंकारिक प्रयोग | • मुकुट शुभ्र हिम-तुषार (रूपक अलंकार) • गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले (रूपक अलंकार) • शतमुख-शतरव-मुखरे! (अनुप्रास अलंकार) |
| समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग | • कनक-शस्य-कमलधरे ! • तरु-तृण-वन-लता • गर्जितोर्मि / ज्योतिर्जल-कण |
| संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग | • धोता शुचि चरण युगल / स्तव कर बहु-अर्थ-भरे ! • प्राण प्रणव ओंकार, / ध्वनित दिशाएँ उदार |
विषयों से संवाद :
1. स्वतंत्रता-पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक/परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?
उत्तर: वर्तमान संदर्भ में भारत का स्वरूप केवल कृषि और प्राचीन ज्ञान तक सीमित न रहकर एक आधुनिक और आत्मनिर्भर महाशक्ति का बन चुका है। नए रूप में निम्नलिखित विशेषताओं को सम्मिलित किया जा सकता है:
वैज्ञानिक व तकनीकी प्रगति: अंतरिक्ष विज्ञान (इसरो के चंद्रयान/मंगलयान मिशन), डिजिटल क्रांति (यूपीआई, सूचना प्रौद्योगिकी) और नवाचार।
युवा शक्ति व उद्यमशीलता: विश्व के सबसे बड़े स्टार्ट-अप तंत्र और युवा कौशल का उभार।
पर्यावरण के प्रति वैश्विक नेतृत्व: सौर ऊर्जा और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी हरित पहलें।
विविधता में आधुनिक एकता: आधुनिक जीवनशैली अपनाते हुए भी अपनी प्राचीन परंपराओं, योग और आयुर्वेद को विश्व पटल पर स्थापित करने की क्षमता।
2. "शतमुख-शतरव-मुखरे!" पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की संकल्पना को साकार करते हैं?
उत्तर:
'शतमुख-शतरव' का अर्थ है सैकड़ों मुखों से निकलने वाले विविध स्वर। भारत में अनेक राज्य, भाषाएँ, बोलियाँ, पर्व (जैसे पोंगल, बिहू, बैसाखी, छठ, ओणम) और उत्सव हैं।
यद्यपि इन उत्सवों के नाम, भाषा और मनाने के तरीके अलग-अलग हैं, किंतु सबके मूल में प्रकृति के प्रति आभार, कृषि-उल्लास, भ्रातृत्व और मानवीय मूल्य एक जैसे हैं।
यह बहुरंगी विविधता मिलकर एक अखंड राष्ट्र की धड़कन बनाती है। अलग-अलग फूलों से गुँथी एक ही माला की तरह यह विविधता 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को जीवंत और साकार करती है।
3. भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।
प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा: सुदृढ़ भारत की त्रिवेणी
भारत की शक्ति उसकी भौगोलिक, सांस्कृतिक और वैचारिक समृद्धि में निहित है:
प्रकृति: हिमालय प्रहरी के रूप में जलवायु और सीमाओं की रक्षा करता है, जबकि गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी नदियाँ उपजाऊ मैदान देकर कृषि और जीवन को सशक्त बनाती हैं। समृद्ध जैव विविधता देश को आर्थिक और पर्यावरणीय सुरक्षा प्रदान करती है।
संस्कृति: ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' जैसी सांस्कृतिक धारणाओं ने भारत को आंतरिक रूप से सहिष्णु, समावेशी और अखंड बनाए रखा है।
ज्ञान-परंपरा: वेदों, उपनिषदों, नालंदा-तक्षशिला से लेकर शून्य, गणित, खगोलशास्त्र और आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान-परंपरा ने भारत को विश्वगुरु का दर्जा दिलाया था। आज यही ज्ञान-चेतना आधुनिक शोध और नवाचार से जुड़कर देश को आत्मनिर्भर और विश्व पटल पर सशक्त बना रही है।
4. कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर:
नदियों पर प्रभाव (गंगा):
औद्योगिक कचरे, रासायनिक अपशिष्ट और सीवेज के सीधे विसर्जन से गंगा का निर्मल 'ज्योतिर्जल' अत्यधिक प्रदूषित हो गया है।
बढ़ता प्रदूषण जलीय जीवों के अस्तित्व को मिटा रहा है और नदी के 'धवल' (स्वच्छ) रूप को गँदला बना रहा है।
हिमालय पर प्रभाव:
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे उसका श्वेत 'हिम-तुषार मुकुट' सिकुड़ रहा है।
अनियंत्रित निर्माण कार्यों और वृक्षों के कटने से भूस्खलन, बादल फटने और आकस्मिक बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ गई हैं, जिससे हिमालय के पूरे पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
विविध रंग भारत के
प्रस्तुति / पोस्टर का शीर्षक: "अनेकता में एकता: विविध रंग भारत के"
चार प्रमुख क्षेत्रों (दिशाओं) के आधार पर विभाजन
उत्तर भारत (हिमालयी व मैदानी छटा):
पारंपरिक वेशभूषा: जम्मू-कश्मीर का फेरन, पंजाब का कुर्ता-पायजामा व फुलकारी दुपट्टा।
प्रमुख लोकनृत्य व संगीत: पंजाब का भांगड़ा/गिद्धा, उत्तर प्रदेश का कत्थक व चरकुला।
प्रमुख पर्व व खान-पान: लोहड़ी, बैसाखी; मक्के की रोटी-सरसों का साग, कश्मीरी कहवा।
दक्षिण भारत (तटीय व मंदिर संस्कृति):
पारंपरिक वेशभूषा: तमिलनाडु की कांजीवरम रेशमी साड़ी, पुरुषों की वेष्टि/मुंडू।
प्रमुख लोकनृत्य व संगीत: केरल का कथकली/मोहिनीअट्टम, कर्नाटक व तमिलनाडु का भरतनाट्यम एवं कर्नाटक संगीत।
प्रमुख पर्व व खान-पान: पोंगल, ओणम; डोसा, इडली, सांभर, पायसम।
पश्चिम भारत (मरुभूमि व उत्सवों की उमंग):
पारंपरिक वेशभूषा: राजस्थान की घाघरा-चोली व बाँधनी पगड़ी, महाराष्ट्र की नौवारी साड़ी।
प्रमुख लोकनृत्य व संगीत: गुजरात का गरबा/डांडिया, राजस्थान का घूमर, महाराष्ट्र की लावणी।
प्रमुख पर्व व खान-पान: गणेशोत्सव, नवरात्रि; दाल-बाटी-चूरमा, ढोकला, पूरनपोली।
पूर्वोत्तर एवं पूर्व भारत (प्राकृतिक सौंदर्य व जनजातीय विरासत):
पारंपरिक वेशभूषा: असम का मेखला चादर, बंगाल की लाल पाड़ साड़ी।
प्रमुख लोकनृत्य व संगीत: असम का बिहू नृत्य, पश्चिम बंगाल का बाउल संगीत व रवींद्र संगीत, मणिपुर का मणिपुरी रास।
प्रमुख पर्व व खान-पान: रोंगाली बिहू, दुर्गा पूजा; माछेर झोल, रसगुल्ला, मोमोज।
पोस्टर / कोलाज बनाने के सुझाव
मध्य भाग: केंद्र में भारत का मानचित्र बनाएं और उसमें तिरंगे के रंग भरें या 'विविधता में एकता' का प्रतीक चिह्न लगाएं।
चित्र व कट-आउट्स: चारों कोनों पर विभिन्न राज्यों के पारंपरिक परिधानों, लोकनृत्यों (जैसे भांगड़ा, कथकली, गरबा, बिहू) और ऐतिहासिक स्मारकों (ताजमहल, कोणार्क, हवामहल) के चित्र चिपकाएं।
स्लोगन (नारा): कोलाज के शीर्ष या नीचे यह पंक्ति लिखें:
"भाषा, वेश, रीति-रिवाज अलग भले हमारे हैं,
फिर भी हम सब एक सूत्र में गुँथे भारत माता के प्यारे हैं।"
"सृजन"
1. मान लीजिए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?
(उदाहरण: उत्तर प्रदेश/हिंदी भाषी क्षेत्र के सांस्कृतिक संदर्भ में)
वेशभूषा (परिधान):
बनारसी रेशमी जरीदार साड़ी या अवध का प्रसिद्ध बारीक चिकनकारी कुर्ता व अंगवस्त्रम। यह वस्त्र भारत की समृद्ध हथकरघा परंपरा और कलात्मक सुरुचि को दर्शाएगा।
आभूषण:
गले में पवित्र रुद्राक्ष की माला और मोतियों का कंठहार (जो गंगा की धारा का प्रतीक हो), कानों में कुंडल तथा कलाई में सोने के कंगन।
माथे का चिह्न (तिलक):
माथे पर चंदन और कुमकुम का त्रिपुंड या तिलक, जो शांति, ज्ञान और भारतीय अध्यात्म का परिचायक हो।
पुष्प शृंगार:
ब्रह्मकमल और गेंदे के ताजे फूलों की महकती माला, जो पवित्रता और मांगलिकता का प्रतीक बने।
हस्त चिह्न:
एक हाथ में ज्ञान की मुद्रा (अभय मुद्रा) और दूसरे हाथ में अन्न की सुनहली बालियाँ (कनक-शस्य), जो शांति और संपन्नता दोनों का संदेश दें।
2. भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ (Cover Page) बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?
आवरण पृष्ठ / डाक टिकट की रूपरेखा:
केंद्र में: अशोक चक्र और तिरंगे के तीन रंगों का सुरुचिपूर्ण संयोजन, जो संप्रभुता और राष्ट्रधर्म का प्रतीक है।
पृष्ठभूमि के शीर्ष पर: बर्फ से ढकी हिमालय की ऊँची चोटियाँ और सूर्य की सुनहली किरणें (अडिग स्वाभिमान और नई आशा का प्रतीक)।
निचले भाग में: एक तरफ कल-कल बहती गंगा नदी और दूसरी तरफ लहराते हुए धान व गेहूँ के खेत (प्रकृति, कृषि और जन-जीवन का पोषण)।
आधुनिक प्रतीक: इसरो का रॉकेट (चंद्रयान) और डिजिटल भारत का नेटवर्क ग्रिड (वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और तकनीकी शक्ति)।
सांस्कृतिक प्रतीक: मोर (राष्ट्रीय पक्षी), कमल का फूल (ज्ञान व शुचिता) और सभी प्रमुख धर्मों/भाषाओं की सांकेतिक लिपियाँ।
सम्मिलित करने का कारण: ये प्रतीक मिलकर भारत के गौरवशाली अतीत (विरासत), समृद्ध वर्तमान (कृषि व संस्कृति) और उज्ज्वल भविष्य (विज्ञान व तकनीक) के संतुलित समन्वय को एक ही दृष्टि में स्पष्ट करते हैं।
3. नदी की यात्रा (गंगा नदी का रोचक यात्रा-वृत्तांत)
पर्वतों की गोद से शुरुआत (गंगोत्री से हरिद्वार तक): मेरी यात्रा उत्तराखंड में हिमालय की ऊँचाइयों पर स्थित गोमुख ग्लेशियर से भागीरथी के रूप में आरंभ होती है। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर मैं 'गंगा' बनती हूँ। यहाँ मेरा जल बर्फ की तरह शीतल, पारदर्शी और तीव्र गति वाला होता है। ऋषिकेश और हरिद्वार के संकरे पर्वतीय रास्तों से गुजरते हुए, घंटों की गूँज और शाम की भव्य गंगा आरती के बीच, मैं समतल मैदानों में प्रवेश करती हूँ।
मैदानी विस्तार और सांस्कृतिक संगम (हरिद्वार से प्रयागराज व काशी तक): मैदानों में आते ही मेरी गति शांत और पाट चौड़ा हो जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार की उपजाऊ मिट्टी को सींचते हुए मैं खेतों में 'कनक-शस्य' (सोने जैसी फसलें) उपजाती हूँ। प्रयागराज में यमुना और अदृश्य सरस्वती से मिलकर 'त्रिवेणी संगम' का निर्माण करती हूँ। आगे बढ़ते हुए मोक्षनगरी काशी (वाराणसी) के 84 घाटों पर संतों के मंत्रोच्चार, ज्ञान-चर्चा और दीपदान के आलोक में मेरा स्वरूप आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बन जाता है।
समतल धारा और भाषिक विविधता (बिहार से पश्चिम बंगाल तक): आगे की यात्रा में मैं हिंदी, मैथिली, मगही और अंगिका की मिठास को समेटते हुए पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती हूँ, जहाँ मुझे 'हुगली' और 'पद्मा' के नाम से जाना जाता है। यहाँ का वातावरण रवींद्र संगीत और बाउल गीतों के स्वरों से गुंजायमान रहता है।
महासागर में विलीन (गंगासागर): विशाल डेल्टा (सुंदरवन) बनाते हुए अंततः मैं 'गंगासागर' पहुँचकर बंगाल की खाड़ी के अगाध जल में विलीन हो जाती हूँ। उद्गम की संकरी धारा से लेकर सागर-मिलन तक की यह यात्रा भारत के भूगोल, कृषि, संस्कृति और अध्यात्म को एक जीवन-सूत्र में पिरोने की अनवरत साधना है।
भाषा से संवाद (व्याकरण की बात)
1. बहुभाषी देश हमारा (मातृभाषा और हिंदी में संवाद)
(संकेत: पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण पर संवाद - उदाहरण: अवधी / भोजपुरी और मानक हिंदी)
मातृभाषा (अवधी/भोजपुरी स्वरूप):
नागरिक: हे भारत महतारी! तोहार नदियन अउर जंगल आज संकट मा बाटैं। हम पंचन के का करय चाही?
भारतमाता: मोर दुलरुवा बच्चा! तोहार जिम्मेदारी बा कि नदियन के साफ रक्खा अउर खूब पेड़-पौधा लगावा, तबहीं हमार ई हरियर रूप बचल रही।
मानक हिंदी अनुवाद:
नागरिक: हे भारत माता! आपकी नदियाँ और वन आज प्रदूषण के संकट में हैं। एक सजग नागरिक के रूप में हमें क्या करना चाहिए?
भारतमाता: मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारा कर्तव्य है कि नदियों को निर्मल रखो और अधिक से अधिक वृक्ष लगाओ, तभी मेरा यह हरा-भरा और समृद्ध रूप सुरक्षित रहेगा।
2. मातृभाषा और भाव (भारत स्तुति की लघु कविता एवं भावार्थ)
मातृभाषा में कविता (अवधी/भोजपुरी शैली):
जय-जय हे पावन भारत देस,
सुंदर रूप, निराला भेस।
गंगा-जमुना सींचे माटी,
हरियर झूमे खेत अउर घाटी।
हिंदी भावार्थ: हे पवित्र भारत देश! आपकी जय हो। आपका रूप और वेश अत्यंत अनुपम है। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियाँ इस पावन मिट्टी को सींचती हैं, जिससे हमारे खेत और पर्वत-घाटियाँ हरियाली से लहलहा उठती हैं।
3. समास — समस्त पद एवं विग्रह
दिए गए सामासिक शब्दों का सही विग्रह और उनके समास का नाम:
शतदल:
समास-विग्रह: शत (सौ) दलों (पंखुड़ियों) का समूह / सौ दल हैं जिसमें वह (कमल)
समास का नाम: द्विगु समास / बहुव्रीहि समास
ज्योतिर्जल:
समास-विग्रह: ज्योति (प्रकाश) रूपी जल
समास का नाम: कर्मधारय समास
शतमुख:
समास-विग्रह: शत (सौ) मुखों का समूह
समास का नाम: द्विगु समास
सागरजल:
समास-विग्रह: सागर का जल
समास का नाम: तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष)
4. अलंकार — समझ और प्रयोग
(क) कविता में जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, वे पंक्तियाँ:
'शतमुख-शतरव-मुखरे!' — यहाँ 'श' वर्ण की पुनरावृत्ति हुई है।
'तरु-तृण-वन-लता वसन' — यहाँ 'त' और 'व' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।
'धवल धार हार' — यहाँ 'ध' और 'र' वर्ण की आवृत्ति हुई है।
(ख) कविता की वे पंक्तियाँ जहाँ रूपक अलंकार है तथा चित्रित प्राकृतिक दृश्य:
पंक्ति 1: “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार”
प्राकृतिक दृश्य: हिमालय की श्वेत बर्फ (हिम-तुषार) को बिना किसी उपमा के सीधे भारतमाता का 'मुकुट' रूप दिया गया है।
पंक्ति 2: “तरु-तृण-वन-लता वसन, / अंचल में खचित सुमन”
प्राकृतिक दृश्य: वृक्षों, तिनकों, वनों और लताओं को माँ के 'वस्त्र' तथा फूलों को आँचल में जड़े 'रत्न/नगीने' माना गया है।
पंक्ति 3: “गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।”
प्राकृतिक दृश्य: गंगा की निर्मल और श्वेत जलधारा को भारतमाता के गले का 'हार' रूप दिया गया है।
पंक्ति 4: “लंका पदतल शतदल”
प्राकृतिक दृश्य: लंका द्वीप को भारतमाता के चरणों में सुशोभित 'कमल' (शतदल) के रूप में चित्रित किया गया है।
"गतिविधियाँ"
"तरु-तृण-वन-लता वसन / अंचल में खचित सुमन"
वन, लता, पुष्प आदि भारत के अमूल्य प्राकृतिक संसाधन हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियमों और नियमों का विवरण:
1. भारत सरकार द्वारा बनाए गए प्रमुख पर्यावरण व वन संरक्षण अधिनियम
भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927):
वनों को आरक्षित (Reserved), संरक्षित (Protected) और ग्रामीण वनों में वर्गीकृत करता है।
वन संपदा की अनधिकृत कटाई, शिकार और चराई पर कानूनी रोक लगाता है।
वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act, 1980):
गैर-वानिकी कार्यों (उद्योग, निर्माण, खनन) के लिए वनों की कटाई पर केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य करता है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972):
संकटग्रस्त वन्यजीवों के शिकार और उनकी तस्करी को गैर-कानूनी घोषित करता है तथा राष्ट्रीय उद्यानों व वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना का प्रावधान करता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (NGT Act, 2010):
पर्यावरण, वन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े कानूनी विवादों के त्वरित समाधान के लिए समर्पित न्यायाधिकरण का गठन करता है।
2. वन संरक्षण के मुख्य नियम और नागरिक दायित्व
वृक्षारोपण की अनिवार्यता: गैर-वानिकी उपयोग के बदले अनिवार्य रूप से क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) करना।
सामुदायिक सहभागिता: वन अधिकार अधिनियम (FRA, 2006) के अंतर्गत वनों में रहने वाले आदिवासी व ग्रामीण समुदायों के अधिकारों की रक्षा करते हुए उन्हें वन-प्रबंधन से जोड़ना।
दावानल (जंगल की आग) से बचाव: गर्मी के मौसम में मानवीय लापरवाही से जंगलों में लगने वाली आग की रोकथाम के लिए कड़े सुरक्षा नियम लागू करना।
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध: वन क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यानों और नदियों के आसपास प्लास्टिक और रासायनिक कचरा फेंकने पर दंड का प्रावधान।
3. कक्षा में ली जाने वाली संरक्षण शपथ (शपथ-पत्र)
"हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा लेते हैं कि भारतमाता के वस्त्राभूषण रूपी वनों, वृक्षों, लताओं और वनस्पतियों की रक्षा करेंगे। हम व्यर्थ में पेड़ नहीं काटेंगे, अधिक से अधिक पौधे लगाएंगे और उनकी देखरेख करेंगे। हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को प्रदूषण-मुक्त रखकर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरा-भरा और सुरक्षित भारत बनाएंगे।"
"भाषा संगम" :
1. 'शस्य' (उपज/फसल) शब्द अन्य भाषाओं में
पाठ्यपुस्तक में दी गई भाषाओं के अतिरिक्त 'शस्य' (उपज/फसल/पैदावार) शब्द को अन्य भारतीय व क्षेत्रीय भाषाओं में इस प्रकार कहा जाता है:
राजस्थानी (मारवाड़ी/ढूंढाड़ी): नीपज (नीपजै), फसल, बाड़ी
मैथिली: उपजाऊ, फसल, उपज
भोजपुरी: उपजा, पैदावार, फसल
हरियाणवी: पैदावार, नीपज, फसल
संथाली (Santali): आर्जन (Arjan), फसल
बोडो (Bodo): फसल (Faswl / Fasal)
अंग्रेजी (English): Crop, Harvest, Yield, Produce
2. उपर्युक्त वाक्य अपनी मातृभाषा में
मूल वाक्य: "कनक-शस्य-कमलधरे!" (सोने जैसी फसलों और कमल को धारण करने वाली माँ भारती)
राजस्थानी (मारवाड़ी):
"सोना बरगी उपजाऊ फसलां अर हाथ में कंवल धारण करवाली माँ भारती!"
भोजपुरी:
"सोना जइसन लहलहात फसल आ हाथ में कमल लिहल हे भारत महतारी!"
मैथिली:
"सोना सन फसल आ हाथ मे कमल धारण कएने हे भारत माता!"
पंजाबी:
"ਸੋਨੇ ਵਰਗੀਆਂ ਫ਼ਸਲਾਂ ਅਤੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਕਮਲ ਧਾਰਨ ਵਾਲੀ ਭਾਰਤ ਮਾਤਾ!"
(सोने वरगियां फ़सलां अते हथ्थ विच कमल धारण वाली भारत माता!)
"झरोखे से" स्तंभ में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध देशप्रेम कविता 'जय जय भारतमाता' का अंश संकलित है:
कविता का अंश
"जय जय भारतमाता!
तेरा बाहर भी घर जैसा रहा प्यार ही पाता।
ऊँचा हिया हिमालय तेरा
उसमें कितना दरद भरा
फिर भी आग दबाकर अपनी
रखता है वह हमें हरा
सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी टूटा आता
जय जय भारतमाता!"
— मैथिलीशरण गुप्त
पंक्तिवार अर्थ और भावार्थ
जय जय भारतमाता! / तेरा बाहर भी घर जैसा रहा प्यार ही पाता।
अर्थ: हे भारतमाता, तुम्हारी सदा जय हो! भारत भूमि की यह विशेषता है कि यहाँ आने वाला कोई भी व्यक्ति पराया नहीं लगता; बाहर से आने वाले लोगों को भी यहाँ घर जैसा आत्मीय स्नेह और अपनत्व प्राप्त होता है।
ऊँचा हिया हिमालय तेरा / उसमें कितना दरद भरा
अर्थ: हिमालय पर्वत भारतमाता का ऊँचा और विशाल हृदय ('हिया') है। वह न जाने कितने कष्टों, शीत और आघातों को अपने भीतर समेटे हुए है।
फिर भी आग दबाकर अपनी / रखता है वह हमें हरा / सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी टूटा आता
अर्थ: हिमालय अपने भीतर की तपन या वेदना को दबाकर, अपनी बर्फ को पिघलाकर सैकड़ों झरनों और नदियों के रूप में जल प्रवाहित करता है। वह निरंतर बहती इन नदियों से देश के मैदानों को सींचकर हम सबको हरा-भरा, समृद्ध और जीवन-रस से परिपूर्ण रखता है।
मुख्य भाव एवं तुलना
तुलना: जहाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने अपनी कविता में हिमालय को भारतमाता का उज्ज्वल मुकुट माना है, वहीं मैथिलीशरण गुप्त ने हिमालय को भारतमाता का विशाल एवं दयालु हृदय कहा है।
केंद्रीय संदेश: दोनों ही कवियों ने हिमालय और नदियों को केवल प्राकृतिक स्थल न मानकर भारतभूमि के त्याग, परोपकार, ममता और पोषण की सजीव मूरत के रूप में चित्रित किया है।
"खोजबीन"
1. देशप्रेम से संबंधित प्रसिद्ध कविता (कक्षा में वाचन हेतु)
कविता: 'पुष्प की अभिलाषा'
कवि: माखनलाल चतुर्वेदी
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ!
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना, वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक!
2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की संस्कृतनिष्ठ सरस्वती वंदना
कविता: 'वर दे, वीणावादिनि वर दे!'
रचयिता: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (काव्य-संग्रह: गीतिका)
वर दे, वीणावादिनि वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव, अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर, प्रकाश भर,
जगमग जग कर दे!
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव,
नवल कंठ, नव जलद-मंद्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे!
वर दे, वीणावादिनि वर दे!
संक्षिप्त भावार्थ: इस वंदना में कवि माँ सरस्वती से प्रार्थना करते हैं कि वे समस्त भारतवासियों के हृदय से अज्ञान और रूढ़ियों का अंधकार दूर कर ज्ञान और स्वतंत्रता का अमर मंत्र फूँक दें तथा पूरे राष्ट्र को एक नई गति, लय और नव-चेतना प्रदान करें।
शब्द-संपदा (कठिन शब्द एवं उनके अर्थ):
| शब्द | अर्थ |
| भारति/भारती | सरस्वती, वाणी, वाणी की अधिष्ठात्री, भारतमाता |
| कनक | सोना, पलाश, चंपा |
| शस्य | फसल, खेती, अन्न, धान्य, वृक्षों का फल, नई घास, कोमल तृण, सद्गुण |
| पदतल | तलवा, पैरों के नीचे |
| शतदल | कमल |
| गर्जितोर्मि/गर्जित | बादलों का गर्जन, गरजती तरंगों का |
| शुचि | पवित्र, शुद्ध, निर्मल, साफ, निश्छल, निष्कपट, श्वेत, उजला |
| युगल | जोड़ा, युग्म |
| स्तव | प्रशंसा, स्तुति और स्तोत्र, एक पदार्थ |
| तरु | वृक्ष, पेड़ |
| तृण | तिनका, घास, खर-पात |
| लता | जमीन या किसी आधार पर फैलने वाला पौधा, वल्लरी, बेल |
| वसन | वस्त्र, आवरण, निवास, मूर्ति, प्रतिमा |
| अंचल | देश का प्रांत-भाग, आँचल, कोना, तट, किनारा, वस्त्र का छोर |
| खचित | चिह्नित, अंकित, जड़ा हुआ, आबद्ध |
| सुमन | पुष्प, फूल, गेहूँ, मनोहर, सुंदर |
| ज्योतिर्जल/ज्योतिस् | प्रकाश, रोशनी, लौ, सूर्य, नक्षत्र, अग्नि |
| धवल | सफेद, श्वेत, स्वच्छ, निर्मल, सुंदर |
| धार | जोर की वर्षा, धारा के रूप में बरसना |
| शुभ्र | उज्ज्वल, चमकीला, सफेद, श्वेतवर्ण, सफेद रंग, चाँदी |
| हिम | शीतल बर्फ, पाला, हिमालय पर्वत, चंदन, चंद्रमा |
| तुषार | बर्फ, हिम, हवा में मिली भाप जो जमकर श्वेत कणों के रूप में पृथ्वी पर गिरती है |
| प्राण | वायु, साँस, बल, जीवन |
| प्रणव | ओंकार, परमेश्वर, ढोल |
| ओंकार | 'ओम्' मंत्र या इसका उच्चारण, आरंभ |
| उदार | दानशील, दयालु |
| शतमुख | सौ मुख |
| शतरव | सौ की संख्या में ध्वनि, शब्द, शोर, गुंजार |
| मुखरे/मुखर | बजता, शब्द करता हुआ, शोर करने वाला |
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