मैं कवि हूँ, दिल को पहचानता हूँ,
शब्दों में सागर की गहराई पाता हूँ।
भावनाओं के रंगों में रंगा,
सपनों की दुनिया में खो जाता हूँ।
मुझे आवाज़ की ज़रूरत नहीं,
दिल की गूंज सुनता हूँ, हर पल।
गुमनाम हो, तो भी यह कविता बोले,
मन की हलचलें मेरे शब्दों में मिलें।
कभी चुप रहकर, मन की गहराई में,
कविता का संगीत रचता हूँ।
कभी शब्दों में उड़ता, बिखरता,
ख़ुद को इस बेज़ुबान दुनिया में बुनता हूँ।
मैं कवि हूँ, एक सपना साकार करता,
अपने अंधेरे में, एक सितारा बना देता हूँ।
दलीप सिंह (दीप)
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