जागो बंसीवारे ललना!
जागो मोरे प्यारे!
रजनी बीती, भोर भयो है, घर-घर
खुले किंवारे|
गोपी दही मातहत, सुनियत है
कंगना के झनकारे||
उठो लालजी! भोर भयो है, सुर-नर
ठाड़े द्वारे |
ग्वाल-बाल सब करत कुलाहल, जय-जय
सबद उचारै ||
माखन-रोटी हाथ मँह लीनी, गउवन
के रखवारे|
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सरण
आयाँ को तारै ||
१ प्रस्तुत पद में कृष्ण के
कौन-से रूप का वर्णन किया गया है?
२ गोपियों की कंगन की झंकार
क्यों सुनाई दे रही है?
३ द्वार पर आकर कौन खड़ें हैं?
४ ग्वाल-बालों ने हाथ में क्या
ले रखा है?
५ इस पद के अंत में मीरा ने
कृष्ण को किस रूप में देखा है?
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